भोपाल संवाददाता:रोशनी बिसेन
हर व्यक्ति का सपना होता है कि उसका घर सुख, शांति और समृद्धि का केंद्र बने। वास्तु शास्त्र में घर के निर्माण को लेकर कई ऐसे नियम बताए गए हैं, जिनका पालन करने से सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है। वहीं, इन नियमों की अनदेखी करने पर वास्तु दोष उत्पन्न हो सकते हैं, जिससे आर्थिक तंगी, पारिवारिक तनाव और स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है।
मुख्य द्वार की दिशा सबसे अहम
वास्तु शास्त्र के अनुसार, घर का मुख्य द्वार उत्तर, पूर्व या उत्तर-पूर्व दिशा में होना शुभ माना जाता है। इन दिशाओं में बना प्रवेश द्वार सकारात्मक ऊर्जा का प्रवेश कराता है। वहीं दक्षिण या दक्षिण-पश्चिम दिशा में मुख्य द्वार होने से आर्थिक नुकसान और पारिवारिक कलह की आशंका बढ़ सकती है।
पूजा घर और रसोई का सही स्थान
घर का पूजा घर उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में बनाना सबसे शुभ माना जाता है। इस स्थान पर हल्के और सात्विक रंगों का प्रयोग सकारात्मक वातावरण बनाए रखता है। वहीं रसोई के लिए दक्षिण-पूर्व दिशा उपयुक्त मानी गई है। उत्तर-पूर्व में रसोई होने से धन हानि और स्वास्थ्य संबंधी परेशानियां बढ़ने की मान्यता है।
शयनकक्ष और जल स्रोत की सही दिशा
वास्तु के अनुसार, घर के मुखिया का शयनकक्ष दक्षिण-पश्चिम दिशा में होना चाहिए, जिससे परिवार में स्थिरता और समृद्धि बनी रहती है। इसके अलावा पानी की टंकी, बोरवेल या भूमिगत जल स्रोत उत्तर-पूर्व दिशा में रखना शुभ माना जाता है। मकान की ढलान भी इसी दिशा में रखने की सलाह दी जाती है ताकि सकारात्मक ऊर्जा का प्रवाह बना रहे।
ब्रह्मस्थान को रखें खुला
घर का मध्य भाग, जिसे ब्रह्मस्थान कहा जाता है, हमेशा खुला और साफ-सुथरा होना चाहिए। इस स्थान पर भारी निर्माण या सामान रखने से वास्तु दोष उत्पन्न होने की मान्यता है। वहीं घर के निर्माण की शुरुआत दक्षिण-पश्चिम कोने से करना शुभ माना जाता है।
क्यों जरूरी हैं ये नियम?
वास्तु विशेषज्ञों के अनुसार, यदि घर का निर्माण दिशाओं और वास्तु सिद्धांतों के अनुरूप किया जाए तो घर में सकारात्मक ऊर्जा का संचार बना रहता है। इससे परिवार में सुख-शांति, समृद्धि और मानसिक संतुलन बनाए रखने में मदद मिलती है। हालांकि, इन मान्यताओं का आधार पारंपरिक वास्तु शास्त्र है और इन्हें धार्मिक एवं सांस्कृतिक दृष्टिकोण से देखा जाता है।



