Zomato–Swiggy पर खाना क्यों पड़ता है महंगा? सर्वे में 55% कंज्यूमर्स ने जताई नाराजगी
देशभर में जोमैटो, स्विगी और ब्लिंकिट जैसे फूड डिलीवरी ऐप्स को लेकर कंज्यूमर्स और डिलीवरी वर्कर्स की नाराजगी बढ़ती जा रही है। ऑनलाइन ऑर्डर पर बढ़ती कीमतें अब लोगों के लिए बड़ी चिंता का विषय बनती जा रही हैं।
लोकलसर्कल्स के एक हालिया सर्वे में चौंकाने वाला खुलासा हुआ है। सर्वे के अनुसार, 55 फीसदी कंज्यूमर्स का कहना है कि फूड डिलीवरी ऐप्स के जरिए खाना मंगाने पर उन्हें रेस्टोरेंट में सीधे जाकर खाने की तुलना में कहीं ज़्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं। बढ़ी हुई फूड प्राइस, प्लेटफॉर्म फीस, डिलीवरी चार्ज और टैक्स मिलकर ऑर्डर को महंगा बना देते हैं।
ग्राहकों का आरोप है कि कई बार ऐप पर दिखने वाली कीमतें रेस्टोरेंट के ऑफलाइन मेन्यू से काफी ज्यादा होती हैं। वहीं डिलीवरी वर्कर्स भी कम कमाई और ज्यादा काम के दबाव को लेकर असंतोष जाहिर कर रहे हैं।
विशेषज्ञों के मुताबिक, ऐप्स द्वारा लिए जाने वाले कमीशन, टेक्नोलॉजी खर्च और लॉजिस्टिक्स लागत का बोझ आखिरकार ग्राहकों पर ही डाला जा रहा है। यही वजह है कि फूड डिलीवरी ऐप्स की सुविधा अब धीरे-धीरे महंगी साबित होती जा रही है।
इस बढ़ती नाराजगी के बीच सवाल यह है कि क्या फूड डिलीवरी ऐप्स अपनी प्राइसिंग पॉलिसी में बदलाव करेंगे या फिर ग्राहकों को महंगे खाने की आदत डालनी पड़ेगी?
सर्वे के मुताबिक, ऐप्स पर बढ़ी हुई कीमतें, प्लेटफॉर्म फीस और अन्य चार्ज मिलकर खाने को रेस्टोरेंट की तुलना में काफी महंगा बना देते हैं। यही कारण है कि 55 फीसदी कंज्यूमर्स ने माना कि ऐप से ऑर्डर करने पर उन्हें ज्यादा पैसे चुकाने पड़ते हैं।
79 हजार से ज्यादा लोगों ने दिया सर्वे में जवाब
यह सर्वे देश के 359 जिलों से जुड़े 79,000 से ज्यादा वेरिफाइड नागरिकों के जवाबों पर आधारित है। इसमें 61 प्रतिशत पुरुष और 39 प्रतिशत महिलाएं शामिल रहीं।
शहरों के हिसाब से देखें तो 45 प्रतिशत प्रतिभागी टियर-1 शहरों से, 33 प्रतिशत टियर-2 शहरों से और 22 प्रतिशत टियर-3, टियर-4 व ग्रामीण इलाकों से थे। सर्वे लोकलसर्कल्स प्लेटफॉर्म पर किया गया, जिसमें हिस्सा लेने के लिए रजिस्ट्रेशन अनिवार्य था।
2030 तक 12 लाख करोड़ का होगा फूड डिलीवरी बाजार
रिपोर्ट के अनुसार, भारत का ऑनलाइन फूड डिलीवरी मार्केट 2024 में लगभग 31.8 बिलियन डॉलर (करीब ₹2.86 लाख करोड़) का था। स्मार्टफोन, इंटरनेट की बढ़ती पहुंच और शहरीकरण के चलते इस बाजार के 2030 तक ₹12 लाख करोड़ तक पहुंचने का अनुमान लगाया जा रहा है।
क्विक डिलीवरी ऐप्स पर जंक फूड का दबदबा
सर्वे में एक और चिंताजनक पहलू सामने आया है। शहरी भारत में जंक फूड की खपत तेजी से बढ़ रही है। लोकलसर्कल्स के मुताबिक, क्विक कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध आधे से ज्यादा पैकेट वाले फूड आइटम हाई फैट, चीनी और नमक (HFSS) से भरपूर या अल्ट्रा-प्रोसेस्ड फूड (UPF) की श्रेणी में आते हैं।
सर्वे में यह भी पता चला कि 39 प्रतिशत परिवार नियमित रूप से सॉफ्ट ड्रिंक्स, बिस्कुट, चिप्स और नूडल्स जैसे जंक फूड ऑर्डर करते हैं। यानी हर 10 में से 4 परिवार इस तरह के खाद्य पदार्थ मंगा रहे हैं। इनमें सबसे बड़ा समूह बच्चों और युवाओं का है।
बड़ा सवाल
फूड डिलीवरी ऐप्स की सुविधा जहां लोगों की जिंदगी आसान बना रही है, वहीं बढ़ती कीमतें और जंक फूड की आदत सेहत और जेब—दोनों के लिए खतरा बनती जा रही हैं। ऐसे में सवाल उठता है कि क्या कंपनियां अपनी कमीशन और प्राइसिंग पॉलिसी पर दोबारा विचार करेंगी, या ग्राहकों को महंगे और अनहेल्दी खाने से समझौता करना पड़ेगा?



