भोपाल। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने बुधवार को राजधानी भोपाल के लाल परेड मैदान में आयोजित 11वें अंतरराष्ट्रीय वन मेले का भव्य शुभारंभ किया। इस अवसर पर उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश अब वन्य-प्राणियों के संरक्षण और संवर्धन की दिशा में एक और बड़ा कदम उठाने जा रहा है। मुख्यमंत्री ने बताया कि प्रदेश में गैंडा और जिराफ लाने पर भी विचार किया जा रहा है, जिससे राज्य की जैव-विविधता और अधिक समृद्ध होगी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति में वन गमन की परंपरा प्राचीन काल से चली आ रही है। ऋषि-मुनियों ने वन और प्रकृति के साथ रहकर जीवन को दिशा दी। उन्होंने कहा कि निराशा के क्षणों में वन हमें ऊर्जा और शांति प्रदान करते हैं। जड़ी-बूटियां प्रकृति का अमूल्य वरदान हैं, जिनका कोई विकल्प नहीं है। मेडिकल साइंस अपनी जगह है, लेकिन आयुर्वेद की ताकत अद्भुत है।
डॉ. मोहन यादव ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के मार्गदर्शन में आयुर्वेद को वैश्विक पहचान मिली है। पीएम मोदी ने न सिर्फ आयुर्वेद को बढ़ावा दिया, बल्कि स्वयं भी इसे अपनाया। कोविड काल में आयुर्वेदिक काढ़ा अमृत समान साबित हुआ और लाखों लोगों को लाभ पहुंचाया।
मुख्यमंत्री ने जानकारी दी कि प्रदेश में लगातार आयुर्वेदिक कॉलेज खोले जा रहे हैं, जिससे इस प्राचीन चिकित्सा पद्धति को और मजबूती मिल रही है। उन्होंने कहा कि भारतीय संस्कृति में वृक्षों और वनों के संरक्षण की समृद्ध परंपरा रही है और अंतरराष्ट्रीय वन मेला इसी परंपरा को आगे बढ़ा रहा है।
इस वन मेले में 350 से अधिक आयुर्वेदिक उत्पादों के स्टॉल लगाए गए हैं। साथ ही 80 आयुर्वेदिक डॉक्टर और 100 से अधिक वैद्य आम नागरिकों को निःशुल्क परामर्श प्रदान कर रहे हैं। मुख्यमंत्री ने कहा कि वन मेला पूरे प्रदेश की पहचान बन चुका है और इसका सभी को बेसब्री से इंतजार रहता है।
कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री ने वन, वनोपज और वन्य-प्राणियों को मध्यप्रदेश की असली पहचान बताते हुए इनके संरक्षण और संवर्धन के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई।
घर-घर में आयुर्वेदिक नुस्खों का भंडार
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने कहा कि आज लघु वनोपज से बने अनेक उत्पाद बाजार में उपलब्ध हैं और जब एलोपैथिक दवाएं राहत नहीं देतीं, तब लोग आयुर्वेद की ओर रुख करते हैं। उन्होंने कहा कि भारतीय समाज के हर घर में आयुर्वेदिक नुस्खों का खजाना मौजूद है, जो पीढ़ियों से चला आ रहा है।
मुख्यमंत्री ने कहा कि वर्तमान समय में मेडिकल साइंस की अपनी महत्ता है, लेकिन आयुर्वेदिक उत्पादों का कोई विकल्प नहीं है। कोरोना काल में आयुर्वेदिक काढ़ा पूरी दुनिया के लिए अमृत समान सिद्ध हुआ। राज्य सरकार आयुर्वेद चिकित्सा और योग को बढ़ावा देने के लिए निरंतर कार्य कर रही है।
डॉ. यादव ने बताया कि पहले प्रदेश में केवल 7 शासकीय आयुर्वेद महाविद्यालय थे, जबकि पिछले एक वर्ष में 8 नए शासकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय प्रारंभ किए गए हैं। इससे आयुर्वेदिक शिक्षा और चिकित्सा को नई मजबूती मिली है और आने वाले समय में इसका लाभ आम जनता को व्यापक स्तर पर मिलेगा।
वन मेले में मिलेगा पारंपरिक व्यंजनों का स्वाद
मुख्यमंत्री ने बताया कि अंतरराष्ट्रीय वन मेले में प्रदेश के जिला यूनियन, वन विभाग, वन धन केंद्र, जड़ी-बूटी संग्राहक, उत्पादक, आयुर्वेदिक औषधि निर्माता तथा परंपरागत भोजन सामग्री के निर्माता एवं विक्रेता अपने उत्पादों का प्रदर्शन और विक्रय कर रहे हैं। मेले में 10 शासकीय स्टॉल, 24 अन्य राज्यों के स्टॉल, 16 प्रदर्शनी स्टॉल, 136 प्राइवेट स्टॉल और 26 फूड स्टॉल लगाए गए हैं। यहां आलीराजपुर का दालपानिया, छिंदवाड़ा की वन रसोई और बांधवगढ़ के गोंडी व्यंजन जैसे पारंपरिक स्वाद लोगों को आकर्षित कर रहे हैं।
“समृद्ध वन, खुशहाल जन” है इस साल की थीम
वन एवं पर्यावरण राज्य मंत्री दिलीप अहिरवार ने कहा कि मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव के मार्गदर्शन में वन विभाग लघु वनोपज के माध्यम से छोटे उद्यमियों को भी समृद्ध बना रहा है। उन्होंने बताया कि उज्जैन में भी वन मेले का आयोजन किया जाएगा।
गौरतलब है कि भोपाल के लाल परेड ग्राउंड में यह वन मेला 17 से 23 दिसंबर तक आयोजित किया जा रहा है। इस वर्ष वन मेले की थीम “समृद्ध वन, खुशहाल जन” रखी गई है, जो प्रदेश की वन संपदा, आयुर्वेद और जनकल्याण के संकल्प को दर्शाती है।
