उज्जैन में UGC नियमों के विरोध में सवर्ण समाज का जोरदार प्रदर्शन, मशाल और मोबाइल लाइट मार्च निकालकर जताया आक्रोश
उज्जैन। भगवान महाकालेश्वर की नगरी शुक्रवार को विरोध की ज्वाला से दहक उठी। केंद्र सरकार के हालिया नीतिगत फैसलों और विश्वविद्यालयों में लागू होने वाले नए UGC नियमों के खिलाफ सवर्ण समाज के हजारों लोग सड़कों पर उतर आए। टावर चौक से लेकर शहीद पार्क तक निकाले गए ‘मशाल और मोबाइल लाइट मार्च’ के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकार के खिलाफ जमकर नारेबाजी की।
इस विरोध मार्च में बड़ी संख्या में छात्र, पुजारी, सामाजिक कार्यकर्ता और विभिन्न संगठनों के पदाधिकारी शामिल हुए। हाथों में जलती मशालें और मोबाइल की लाइटें लिए प्रदर्शनकारियों ने UGC के नए नियमों को “काला कानून” बताते हुए इसे तुरंत वापस लेने की मांग की।
प्रदर्शनकारियों का कहना है कि नए नियमों से उच्च शिक्षा व्यवस्था पर नकारात्मक प्रभाव पड़ेगा और सामाजिक संतुलन बिगड़ सकता है। वक्ताओं ने चेतावनी दी कि यदि सरकार ने इन नियमों पर पुनर्विचार नहीं किया, तो आंदोलन को राज्यव्यापी और राष्ट्रव्यापी स्तर पर ले जाया जाएगा।
मार्च के दौरान टावर चौक, फ्रीगंज और शहीद पार्क क्षेत्र में भारी भीड़ जमा रही, जिससे कुछ समय के लिए यातायात भी प्रभावित हुआ। स्थिति को देखते हुए पुलिस प्रशासन ने सुरक्षा के कड़े इंतजाम किए। हालांकि, पूरा प्रदर्शन शांतिपूर्ण रहा।
आंदोलनकारियों ने अंत में राष्ट्रपति के नाम ज्ञापन सौंपने की घोषणा करते हुए कहा कि यह सिर्फ शुरुआत है और आने वाले दिनों में संघर्ष और तेज़ होगा।
महेश शर्मा ने कहा कि देश में आरक्षण की व्यवस्था मूल रूप से 10 वर्षों के लिए लागू की गई थी, लेकिन राजनीतिक लाभ के लिए इसे लगातार बढ़ाया जाता रहा। उन्होंने सवाल उठाते हुए कहा,
“क्या इस देश में केवल एक ही वर्ग के साथ अत्याचार हुआ है? क्या ब्राह्मणों, राजपूतों और अन्य सवर्ण समाज ने हमेशा सेवा और संरक्षण के अलावा कुछ नहीं किया?”
उन्होंने शिक्षा व्यवस्था का उदाहरण देते हुए कहा कि आज 90 प्रतिशत अंक लाने वाले छात्र भी अवसरों के लिए भटक रहे हैं, जबकि कम अंकों वाले अभ्यर्थियों को प्राथमिकता दी जा रही है। शर्मा ने इसे सामाजिक असंतुलन का कारण बताते हुए कहा कि इससे योग्य युवाओं में निराशा बढ़ रही है।
अपने संबोधन के अंत में उन्होंने समाज से एकजुट होने का आह्वान करते हुए कहा,
“अगर अब भी समाज नहीं जागा, तो आने वाली पीढ़ियां हमें माफ नहीं करेंगी।”
उनके इस बयान पर मौके पर मौजूद प्रदर्शनकारियों ने समर्थन में नारे लगाए। हालांकि प्रशासन की ओर से स्थिति पर नजर बनाए रखने और शांति व्यवस्था सुनिश्चित करने की बात कही गई है।
आश्विन रघुवंशी ने अपनी व्यथा साझा करते हुए कहा,
“मैं पूरी फीस भरता हूँ, मुझे किसी भी तरह की सरकारी सहायता नहीं मिलती, लेकिन जब नौकरी की बारी आती है तो मुझे अंतिम पंक्ति में खड़ा कर दिया जाता है।”
उन्होंने आरोप लगाया कि UGC के नए नियमों के नाम पर सामान्य वर्ग के छात्रों को ‘पीड़क (Oppressor)’ के रूप में पेश किया जा रहा है, जबकि वास्तविक स्थिति इससे अलग है। रघुवंशी ने सवाल उठाते हुए कहा,
“जब सवर्ण समाज की आबादी करीब 25 प्रतिशत बताई जाती है, तो वह 75 प्रतिशत बहुसंख्यक वर्ग पर अत्याचार कैसे कर सकता है?”
छात्र ने विश्वविद्यालय परिसरों में लिखे जा रहे कुछ नारों पर भी आपत्ति जताई। उनका दावा है कि कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की दीवारों पर आपत्तिजनक नारे लिखे जा रहे हैं, जिससे सामान्य वर्ग के छात्रों के अस्तित्व और सम्मान पर प्रश्नचिह्न लग रहा है।
उन्होंने कहा कि इस तरह के माहौल से छात्रों में असुरक्षा और मानसिक दबाव बढ़ रहा है। रघुवंशी ने सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन से मांग की कि शिक्षा परिसरों में संतुलन, निष्पक्षता और सम्मानजनक वातावरण सुनिश्चित किया जाए।
सुरेंद्र चतुर्वेदी ने आरोप लगाया कि सरकार आंकड़ों की बाजीगरी के जरिए समाज में जातिगत विभाजन को बढ़ावा दे रही है। उन्होंने कहा,
“जो बच्चे वर्षों से एक साथ पढ़ते-लिखते आ रहे थे, उनके बीच इस तथाकथित ‘काले कानून’ ने नफरत का बीज बो दिया है।”
उन्होंने कहा कि शिक्षा व्यवस्था का उद्देश्य समाज को जोड़ना होता है, लेकिन नए नियमों से छात्रों के बीच अविश्वास और वैमनस्य की भावना पनप रही है। चतुर्वेदी ने सरकार से मांग की कि इस कानून को तत्काल वापस लिया जाए और सभी वर्गों के हितों को ध्यान में रखते हुए संवाद की प्रक्रिया शुरू की जाए।
अपने बयान के अंत में उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा कि यदि सरकार ने इस मुद्दे को गंभीरता से नहीं लिया, तो
“यह चिंगारी पूरे देश में दावानल का रूप ले सकती है।”
प्रशासन की ओर से फिलहाल स्थिति पर नजर रखने और शांति बनाए रखने की अपील की गई है।



