भोपाल। राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) की सेंट्रल जोन बेंच ने रेत खनन से जुड़ी 9 मंजूरियों को अवैध करार देते हुए शून्य घोषित कर दिया है। ये मंजूरियां राज्य पर्यावरण प्रभाव आकलन प्राधिकरण (SEIAA) के मूल्यांकन के बिना ही सीधे प्रमुख सचिव के अनुमोदन पर जारी की गई थीं। एनजीटी ने स्पष्ट कहा है कि SEIAA की स्वीकृति अनिवार्य है और इसके बिना किसी भी खदान में रेत खनन नहीं किया जा सकता।
एनजीटी ने अपने आदेश में कहा कि पर्यावरणीय नियमों की अनदेखी कर दी गई, जो कानूनन स्वीकार्य नहीं है। इसके साथ ही सभी मामलों को पुनर्विचार के लिए SEIAA को वापस भेज दिया गया है।
यह है पूरा मामला
वर्ष 2025 में मार्च से मई के बीच SEIAA की कोई बैठक नहीं हो सकी। उस समय SEIAA के अध्यक्ष एसएनएस चौहान ने बैठक बुलाने के लिए मेंबर सेक्रेटरी आर. उमा महेश्वरी को कई पत्र लिखे, लेकिन वे अवकाश पर चली गईं।
इसके बाद पर्यावरण विभाग के तत्कालीन प्रमुख सचिव नवनीत कोठारी के अनुमोदन पर प्रभारी मेंबर सेक्रेटरी श्रीमन शुक्ला ने 23 मई को 237 ‘डीम्ड’ मंजूरियां जारी कर दीं। इन मंजूरियों को लेकर विवाद खड़ा हुआ और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा।
अब राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण ने इन मंजूरियों को नियम विरुद्ध मानते हुए शून्य घोषित कर दिया है। एनजीटी के इस फैसले को पर्यावरण संरक्षण और नियमों के सख्त पालन की दिशा में अहम माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि इस निर्णय से भविष्य में रेत खनन से जुड़े मामलों में कानूनी प्रक्रिया और पर्यावरणीय मूल्यांकन को लेकर सख्ती बढ़ेगी।
क्या है सिया (SEIAA)? जानिए क्यों है यह संस्था इतनी अहम
रेत खनन और अन्य परियोजनाओं को लेकर हालिया फैसलों के बाद सिया (SEIAA) एक बार फिर चर्चा में है। सिया का पूरा नाम स्टेट एनवायरनमेंट इंपैक्ट असेसमेंट अथॉरिटी (State Environment Impact Assessment Authority) है। यह संस्था प्रदेश स्तर पर पर्यावरण से जुड़ी परियोजनाओं को अनुमति देने वाली सर्वोच्च इकाई मानी जाती है।
भारत सरकार द्वारा तय नियमों के अनुसार, बड़ी परियोजनाओं की मंजूरी केंद्र सरकार देती है, जबकि छोटी और मध्यम स्तर की परियोजनाओं के मामलों में सिया को अधिकार दिए गए हैं। सिया का मुख्य काम किसी भी परियोजना के पर्यावरणीय प्रभाव का मूल्यांकन करना होता है।
नियमों के तहत सिया द्वारा अनुमति देने से पहले विस्तृत परीक्षण और जांच प्रक्रिया अनिवार्य होती है। इसमें यह देखा जाता है कि प्रस्तावित परियोजना से पर्यावरण, जल स्रोत, जैव विविधता और स्थानीय आबादी पर क्या प्रभाव पड़ेगा। बिना जांच के किसी भी परियोजना को अनुमति नहीं दी जा सकती।
विशेषज्ञों के मुताबिक, सिया की भूमिका यह सुनिश्चित करने की होती है कि विकास कार्य पर्यावरण संतुलन को नुकसान पहुंचाए बिना किए जाएं। यही वजह है कि राष्ट्रीय हरित न्यायाधिकरण (NGT) ने भी अपने हालिया आदेश में सिया की स्वीकृति को अनिवार्य बताया है।
साफ है कि सिया की मंजूरी के बिना किसी भी परियोजना को आगे बढ़ाना कानूनन गलत माना जाएगा।



