“बिहार विधानसभा चुनाव 2025 के नतीजों ने सत्ता पक्ष और विपक्ष, दोनों की उम्मीदों को झटका दिया। शुरुआत में जदयू ने ‘2025 में 225’ का बड़ा दावा पेश किया था, जिसे एनडीए के सभी साथी दलों ने मिलकर हवा दी। मगर अमित शाह के प्रचार में उतरते ही यह लक्ष्य कम होकर 160 सीटों तक सीमित कर दिया गया। धीरे-धीरे 225 का नारा गायब हो गया और अंत में एनडीए सिर्फ एक लाइन पर चुनाव लड़ता दिखा—‘एक बार फिर एनडीए सरकार।’”
चुनावी तस्वीर बताती है कि जनता ने एनडीए के शुरुआती लक्ष्य और उसके वादों पर भरोसा किया, जबकि महागठबंधन की अधिक जनहितकारी घोषणाएँ भी असर नहीं दिखा सकीं। दोनों गठबंधनों ने सामाजिक समीकरण देखते हुए टिकट बांटे थे। महागठबंधन ने एनडीए के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले अति पिछड़ा, कुशवाहा, वैश्य और सवर्ण समुदाय को भी उम्मीदवार बनाया, लेकिन उसे इन वर्गों का समर्थन वैसा नहीं मिला, जैसा उसने सोचा था।”

चुनावी तस्वीर बताती है कि जनता ने एनडीए के शुरुआती लक्ष्य और उसके वादों पर भरोसा किया, जबकि महागठबंधन की अधिक जनहितकारी घोषणाएँ भी असर नहीं दिखा सकीं। दोनों गठबंधनों ने सामाजिक समीकरण देखते हुए टिकट बांटे थे। महागठबंधन ने एनडीए के पारंपरिक वोटर माने जाने वाले अति पिछड़ा, कुशवाहा, वैश्य और सवर्ण समुदाय को भी उम्मीदवार बनाया, लेकिन उसे इन वर्गों का समर्थन वैसा नहीं मिला, जैसा उसने सोचा था।”
“महागठबंधन अपना 2020 वाला प्रदर्शन भी दोहरा नहीं सका, जब उसे 110 सीटें मिली थीं। इतना ही नहीं, लोकसभा चुनाव में मिली सफलता को वह विधानसभा चुनाव में बदलने में भी नाकाम रहा। लोकसभा में विपक्ष ने 10 सीटें जीती थीं, जिनके आधार पर विधानसभा में कम से कम 60 सीटों का अनुमान लगाया जा रहा था, लेकिन नतीजे इस उम्मीद के आसपास भी नहीं पहुँचे।”
“एनडीए की असली मजबूती उसका संगठित और बूथ स्तर तक सक्रिय प्रचार अभियान रहा। भाजपा ने हर बूथ पर रणनीतिक रूप से गतिविधियाँ चलाईं। इसके विपरीत, महागठबंधन की पूरी मुहिम तेजस्वी यादव पर केंद्रित रही। तेजस्वी ने ऊर्जावान और संयमित तरीके से प्रचार किया, लेकिन अपने संदेश को विस्तार से हर सभा में पहुँचाना उनकी प्रमुख चुनौती बनी रहा। वहीं राहुल गांधी की सीमित मौजूदगी और अस्थिर प्रचार ने विपक्ष को नुकसान पहुँचाया।”
महागठबंधन vs एनडीए – मुख्य बिंदु:
एनडीए हमला: “महागठबंधन → जंगलराज लौटेगा”
महागठबंधन प्रतिक्रिया: कमजोर, प्रभावी जवाब नहीं दिया
जमीनी असर: समर्थकों का व्यवहार आरोप को सच दिखाने जैसा
युवा मतदाता: भाषा और बॉडी लैंग्वेज से असहज महसूस
महागठबंधन बनाम एनडीए – मुख्य बिंदु:
विपक्ष कमजोर: वीआईपी और आइपीपी जैसे जाति आधारित दलों के जुड़ने से अपेक्षित लाभ नहीं मिला।
सीट बंटवारा विवाद: महागठबंधन में अप्रिय घटनाएं और नाराजगियां; कई दलों ने टिकट बांटने का आत्मकेंद्रित अंदाज अपनाया।
एनडीए का एकजुट प्रदर्शन: सीट बंटवारा सहज, जनता तक एकजुटता का संदेश गया।
परिणाम: विपक्ष को सोचने पर मजबूर किया कि कमजोर क्यों पड़ा और रणनीतिक गलतियाँ क्या थीं।



