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Dainik Kunj > Latest Posts > बिहार विधानसभा चुनाव 2025 > “बिहार चुनाव परिणाम: नमो–नीतीश गठबंधन ने रचा नया इतिहास, 2010 के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त—बदला बिहार का राजनीतिक भूगोल”
बिहार विधानसभा चुनाव 2025

“बिहार चुनाव परिणाम: नमो–नीतीश गठबंधन ने रचा नया इतिहास, 2010 के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त—बदला बिहार का राजनीतिक भूगोल”

Roshni Bisen
Roshni Bisen
Roshni Bisen - Editor dainikkunj.com
ByRoshni Bisen
रोशनी बिसेन dainikkunj.com की संपादक हैं, जो निष्पक्ष और जनहितकारी पत्रकारिता के लिए समर्पित हैं।
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Published: November 15, 2025
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बिहार विधानसभा चुनाव (Bihar Election 2025) के नतीजों ने राज्य की राजनीतिक तस्वीर पूरी तरह बदल दी है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की जोड़ी ने ऐसा जनादेश हासिल किया है जिसने 2010 के तमाम रिकॉर्ड पीछे छोड़ दिए।

एनडीए (National Democratic Alliance) ने 202 सीटों पर जीत दर्ज कर सत्ता में न सिर्फ दमदार वापसी की, बल्कि यह भी साबित किया कि मतदाता विकास और स्थिर नेतृत्व को प्राथमिकता देने के मूड में हैं। भाजपा 89 सीटों के साथ सबसे बड़ी पार्टी बनी, जबकि जदयू ने 85 सीटें हासिल कर अपने पिछले प्रदर्शन को दोगुना कर दिया।

लगातार लगभग बीस साल की सत्ता के बाद भी एनडीए के खिलाफ इस बार कोई बड़ी सत्ता-विरोधी लहर नहीं दिखी।
विशेषज्ञों का मानना है कि इसके पीछे गठबंधन सरकार का सुशासन, विकास के एजेंडा और बेहतर कानून-व्यवस्था का सशक्त दावा प्रमुख वजह रहा।

चुनाव प्रचार के दौरान एनडीए नेताओं ने जंगलराज के पुराने दौर की तुलना आज के बिहार से करते हुए अपनी उपलब्धियों को जोरदार तरीके से जनता के सामने रखा। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने आत्मविश्वास के साथ इस नरेटिव को आगे बढ़ाया, जिसने मतदाताओं में ‘डबल इंजन सरकार’ के प्रति भरोसा कायम किया और उन्हें एक बार फिर सत्ता में वापसी का समर्थन मिला।

विपक्षी महागठबंधन की उम्मीदें धरी रह गईं।
सात दलों वाले इस गठबंधन को भरोसा था कि वह सत्ता में वापसी करेगा, लेकिन नतीजों ने उसकी पूरी रणनीति को पलट दिया।

तेजस्वी यादव को मुख्यमंत्री और वीआईपी प्रमुख मुकेश सहनी को उप मुख्यमंत्री बनाने की घोषणा भी मतदाताओं को आकर्षित नहीं कर पाई। हालात यह रहे कि मुकेश सहनी की पार्टी विधानसभा में एक भी सीट नहीं जीत सकी।

वाम दलों सहित महागठबंधन के ज्यादातर सहयोगियों को करारी हार का सामना करना पड़ा। वहीं जन सुराज पार्टी के हाल और भी कमजोर रहे—इसके 240 में से एक भी उम्मीदवार अपनी जमानत तक नहीं बचा सका।

एनडीए की जीत की असली वजह उसका संयुक्त और सुस्पष्ट संदेश रहा।
नीतीश सरकार की योजनाओं—पढ़ाई से रोजगार, सुरक्षा से लेकर सिविल सेवा तैयारी सहायता—ने खास तौर पर महिला मतदाताओं पर गहरा प्रभाव छोड़ा।
उद्यमिता के लिए 10 हजार रुपये की सहायता और कानून-व्यवस्था में सुधार ने सरकार के प्रति भरोसा और मजबूत किया।
इस चुनाव में महिला वोट निर्णायक साबित हुए, और उन्होंने स्पष्ट रूप से स्थिरता व सुशासन के पक्ष में मतदान किया।

इसके उलट महागठबंधन पूरे चुनाव में संगठन और संदेश—दोनों स्तरों पर असमंजस में दिखा।
राजद और कांग्रेस के बीच मुख्यमंत्री–उप मुख्यमंत्री के चेहरों को लेकर खींचतान, सीटों के बंटवारे में मतभेद और रणनीति पर असहमति ने गठबंधन को कमजोर छवि दी।

तेजस्वी यादव ने राज्यभर में प्रचार तो किया, लेकिन सहयोगी दलों को साथ लेकर एक संयुक्त एजेंडा तैयार नहीं कर सके।
इसी कारण महागठबंधन का संदेश मतदाताओं तक टूटा-फूटा, कमजोर और अस्पष्ट रूप में पहुंचा, जिसका असर नतीजों में साफ दिखा।

चुनाव में एनडीए ने विकास और कानून-व्यवस्था का ठोस मॉडल सामने रखकर बढ़त बना ली।
सरकार ने अपनी उपलब्धियों और आँकड़ों के साथ बताने की कोशिश की कि बीते वर्षों में क्या बदलाव हुए हैं। इसके मुकाबले महागठबंधन बेरोजगारी, महंगाई और युवाओं की उम्मीदों जैसे मुद्दों को प्रभावी स्वर में पेश नहीं कर सका।
सबसे बड़ी कमजोरी यह रही कि वह भविष्य के लिए कोई स्पष्ट और भरोसेमंद रोडमैप दिखाने में विफल रहा।
मतदाता नौकरी, स्टार्टअप, शिक्षा और सुरक्षित भविष्य से जुड़े ठोस विकल्प चाहते थे—और उन्हें ऐसा विकल्प केवल एनडीए की ओर से मिलता दिखा।

संगठनात्मक स्तर पर महागठबंधन की कमजोरियां भी हार का कारण बनीं।
कई क्षेत्रों में बूथ मैनेजमेंट कमजोर रहा, वहीं कई सीटों पर उम्मीदवार बदलने से स्थानीय नाराज़गी बढ़ी।
कांग्रेस का कमजोर प्रदर्शन पूरे गठबंधन पर भारी पड़ा। टिकट बंटवारे से लेकर प्रचार अभियान तक, कांग्रेस की तैयारी सुस्त दिखी और इसका असर पूरे गठबंधन की एकजुटता पर पड़ा।
नतीजा यह हुआ कि महागठबंधन का संघर्ष धीरे-धीरे बिखरता गया और मतदाताओं के लिए कमज़ोर व अविश्वसनीय साबित हुआ।

इस बार जातीय समीकरण भी महागठबंधन के पक्ष में जैसा अनुमान था, वैसा नहीं चला।
बिहार की सामाजिक सोच तेजी से बदल रही है।
युवा और महिला मतदाता अब जाति से ऊपर उठकर करियर, सुरक्षा, अवसर और स्थिर भविष्य को प्राथमिकता दे रहे हैं।
एनडीए ने इस बदलाव को समझकर अपनी रणनीति उसी अनुसार बनाई, जबकि महागठबंधन पुराने जातीय ढाँचों पर ही निर्भर रहा, जिसका उसे नुकसान हुआ।

नतीजों ने स्पष्ट कर दिया है कि बिहार अब सिर्फ गठबंधन, नारों या राजनीतिक वादों से प्रभावित नहीं होता।
मतदाता सुशासन का ठोस रिकॉर्ड, भरोसेमंद नेतृत्व और आने वाले वर्षों का स्पष्ट विकास मॉडल चाहते हैं।
एनडीए इन तीनों मोर्चों पर जनता को संतुष्ट कर पाया, जबकि महागठबंधन आंतरिक मतभेद, बिखरी रणनीति और कमजोर संदेश की वजह से पीछे रह गया।

“चिराग पासवान बोले — बिहार में नई सरकार 22 नवंबर से पहले, NDA ने तेज की तैयारी”
“बिहार 2025: NDA की धमाकेदार वापसी—महागठबंधन की हार की असली वजहें क्या?”
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