Sawan Special 2026: हिंदू पंचांग के सबसे पवित्र महीनों में शामिल सावन (श्रावण) की शुरुआत हो चुकी है। यह महीना भगवान शिव की आराधना, जलाभिषेक और शिव भक्ति के लिए विशेष महत्व रखता है। देशभर के शिवालयों में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ रही है। इसी बीच भगवान शिव के सात प्राचीन मंदिरों से जुड़ा एक रोचक तथ्य लोगों के बीच चर्चा का विषय बना हुआ है। कहा जाता है कि उत्तराखंड के केदारनाथ से लेकर तमिलनाडु के रामेश्वरम तक भगवान शिव के सात प्रमुख मंदिर लगभग 79° पूर्व देशांतर (East Longitude) के आसपास एक सीधी अक्ष रेखा पर स्थित हैं, जिसे कई लोग ‘शिव शक्ति अक्ष रेखा’ के नाम से भी जानते हैं।
कौन-कौन से हैं ये सात प्रमुख शिव मंदिर?
इस रहस्यमयी रेखा में शामिल प्रमुख मंदिर हैं—
- केदारनाथ (उत्तराखंड)
- श्रीकालाहस्ती (आंध्र प्रदेश)
- एकाम्बरेश्वर (तमिलनाडु)
- अरुणाचलेश्वर (तमिलनाडु)
- जम्बूकेश्वर (तमिलनाडु)
- थिल्लई नटराज (चिदंबरम, तमिलनाडु)
- रामेश्वरम (तमिलनाडु)
इनमें से पांच मंदिरों को पंचमहाभूतों से भी जोड़ा जाता है। श्रीकालाहस्ती वायु, एकाम्बरेश्वर पृथ्वी, जम्बूकेश्वर जल, अरुणाचलेश्वर अग्नि और थिल्लई नटराज आकाश तत्व का प्रतिनिधित्व करते हैं।
आखिर क्या है इस अक्ष रेखा का रहस्य?
इन मंदिरों के बारे में सबसे अधिक चर्चा इस बात को लेकर होती है कि हजारों वर्ष पहले, जब आधुनिक सर्वेक्षण तकनीक, जीपीएस या सैटेलाइट जैसी सुविधाएं मौजूद नहीं थीं, तब इतनी सटीक भौगोलिक स्थिति का चयन कैसे किया गया। यही कारण है कि यह विषय आस्था के साथ-साथ इतिहास, वास्तुकला और प्राचीन भारतीय खगोल विज्ञान में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।
हालांकि, यह भी ध्यान रखना जरूरी है कि इन मंदिरों के लगभग एक ही देशांतर पर होने का दावा लोकप्रिय मान्यता का हिस्सा है। अलग-अलग मंदिरों के वास्तविक भौगोलिक निर्देशांक पूरी तरह समान नहीं हैं, बल्कि वे 79° पूर्व देशांतर के आसपास स्थित हैं। इस संबंध में किसी आधिकारिक वैज्ञानिक संस्था ने यह निष्कर्ष नहीं दिया है कि इन सभी मंदिरों का निर्माण किसी एक योजनाबद्ध अक्ष रेखा के आधार पर किया गया था।
उज्जैन क्यों कहलाता है भारत का ‘ग्रीनविच’?
प्राचीन भारत में उज्जैन को खगोलीय गणनाओं और समय निर्धारण का प्रमुख केंद्र माना जाता था। कई प्राचीन भारतीय ज्योतिष और खगोल ग्रंथों में उज्जैन को संदर्भ बिंदु के रूप में इस्तेमाल किया गया है। इसी कारण इसे ‘भारत का ग्रीनविच’ भी कहा जाता है। माना जाता है कि यहां से ग्रह-नक्षत्रों, पंचांग और समय की गणना की जाती थी। यही वजह है कि उज्जैन का भारतीय खगोल विज्ञान के इतिहास में विशेष स्थान है।
आस्था, प्राचीन वास्तुकला और खगोलीय ज्ञान का यह अनूठा संगम सावन के पावन महीने में श्रद्धालुओं के लिए भगवान शिव की महिमा को और भी विशेष बना देता है।



