भोपाल संवाददाता:रोशनी बिसेन
नई दिल्ली: UPI पेमेंट पर मर्चेंट डिस्काउंट रेट (MDR) लगाए जाने का मामला अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गया है। ₹2,000 से अधिक के कमर्शियल UPI लेनदेन पर शुल्क लगाए जाने के केंद्र सरकार के फैसले को चुनौती देते हुए सुप्रीम कोर्ट में जनहित याचिका दायर की गई है।
एडवोकेट अंजन दत्ता की ओर से दाखिल याचिका में केंद्र सरकार, भारतीय रिजर्व बैंक (RBI), नेशनल पेमेंट्स कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया (NPCI) और UPI से संबंधित प्रावधानों को चुनौती दी गई है। याचिका में वित्त मंत्रालय की ओर से जारी संबंधित गजट अधिसूचनाओं और MDR फ्रेमवर्क को रद्द करने की मांग की गई है।
याचिकाकर्ता ने नई व्यवस्था को मनमानी और भेदभावपूर्ण बताते हुए दावा किया है कि इससे देशभर के कारोबारियों पर अतिरिक्त आर्थिक बोझ पड़ सकता है। याचिका में यह भी तर्क दिया गया है कि सरकार के इस फैसले के लिए पर्याप्त कानूनी आधार नहीं है और इसका असर अप्रत्यक्ष रूप से आम उपभोक्ताओं पर भी पड़ सकता है।
याचिका में कहा गया है कि भले ही प्रस्तावित शुल्क को मामूली बताया जाए और UPI इन्फ्रास्ट्रक्चर को बनाए रखने के लिए जरूरी माना जाए, लेकिन इसका आर्थिक प्रभाव मर्चेंट और अंततः उपभोक्ताओं तक पहुंच सकता है।
विपक्ष ने भी उठाए सवाल
UPI पर MDR लगाए जाने के मुद्दे को लेकर विपक्षी दलों ने भी सरकार पर सवाल उठाए हैं। लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी ने UPI शुल्क को वापस लेने की मांग की है। वहीं, कांग्रेस सांसद कार्ति चिदंबरम ने ₹2,000 से अधिक के मर्चेंट लेनदेन पर 0.4 प्रतिशत MDR लगाए जाने के प्रस्ताव पर चिंता जताई है।
अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका पर सुनवाई के दौरान अदालत के समक्ष MDR व्यवस्था की कानूनी वैधता और इसके संभावित आर्थिक प्रभाव से जुड़े सवाल उठेंगे।




