भोपाल संवाददाता:रोशनी बिसेन
मध्य प्रदेश की राजनीति में राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी के जाति प्रमाण-पत्र का मामला लगातार चर्चा में बना हुआ है। अब इस विवाद ने नया राजनीतिक मोड़ ले लिया है। अनुसूचित जाति मामलों की राज्य स्तरीय छानबीन समिति के अंतिम फैसले से पहले ही सरकार के भीतर नौकरशाही को लेकर असंतोष खुलकर सामने आ गया है।
कैबिनेट बैठक के बाद उप मुख्यमंत्री जगदीश देवड़ा, जनजातीय कार्य मंत्री विजय शाह, राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) दिलीप जायसवाल, गौतम टेटवाल, लखन पटेल और राज्यमंत्री दिलीप अहिरवार ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव से मुलाकात कर एक वरिष्ठ अधिकारी के खिलाफ नाराजगी जताई।
मुनादी के आदेश पर आपत्ति
मंत्रियों का कहना है कि प्रतिमा बागरी के मामले की सुनवाई से पहले विभागीय स्तर पर मुनादी (ढिंढोरा पीटने) का आदेश जारी किया गया, जिससे एक मंत्री की सार्वजनिक छवि प्रभावित हुई। उन्होंने इसे अनुचित बताते हुए आदेश जारी करने वाले अधिकारी के खिलाफ कार्रवाई की मांग की।
क्या है पूरा मामला?
कांग्रेस के अनुसूचित जाति विभाग के प्रदेश अध्यक्ष प्रदीप अहिरवार ने छानबीन समिति में शिकायत दर्ज कर दावा किया है कि प्रतिमा बागरी अनुसूचित जाति की नहीं, बल्कि राजपूत समाज से संबंधित हैं। शिकायत में 1950 और 1977 के गजट का हवाला देते हुए कहा गया है कि बागरी समुदाय को बाद में अनुसूचित जाति की सूची में शामिल किया गया।
प्रतिमा बागरी ने पेश किए ऐतिहासिक दस्तावेज
राज्यमंत्री प्रतिमा बागरी ने समिति के सामने 110 वर्ष पुराने खसरा-खतौनी के रिकॉर्ड और न्यायालयीन दस्तावेज प्रस्तुत करते हुए कहा कि किसी भी पुराने सरकारी रिकॉर्ड में बागरी समाज को राजपूत नहीं बताया गया है। उन्होंने जुगल किशोर बागरी, काशी बागरी, शिवदयाल बागरी और महेंद्र बागरी जैसे नेताओं का उदाहरण भी दिया, जो अनुसूचित जाति वर्ग से चुनाव लड़ते रहे हैं।
बागरी ने यह भी तर्क दिया कि भाजपा ही नहीं, कांग्रेस ने भी वर्षों तक अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित सीटों से बागरी समाज के उम्मीदवारों को टिकट दिया है। ऐसे में अब इस समुदाय की सामाजिक स्थिति पर सवाल उठाना राजनीतिक विरोध का हिस्सा है।
दो सप्ताह में आ सकता है फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें और दस्तावेज सुनने के बाद अब राज्य स्तरीय छानबीन समिति सभी रिकॉर्ड का परीक्षण कर रही है। सूत्रों के अनुसार, अगले दो सप्ताह के भीतर समिति अपना फैसला सुना सकती है। यह फैसला न केवल प्रतिमा बागरी के राजनीतिक भविष्य के लिए महत्वपूर्ण होगा, बल्कि प्रदेश की राजनीति पर भी इसका असर पड़ सकता है।
शिकायतकर्ता और प्रतिमा बागरी, दोनों पक्षों ने समिति के समक्ष अपने-अपने दावे और दस्तावेज प्रस्तुत किए हैं। अंतिम निष्कर्ष राज्य स्तरीय छानबीन समिति के आधिकारिक फैसले के बाद ही स्पष्ट होगा।



