Supreme Court Gave Verdict Example of Manusmriti: मनुस्मृति का हवाला देकर सुप्रीम कोर्ट का अहम फैसला, ससुर की मौत के बाद भी विधवा बहू को भरण-पोषण का अधिकार
जिस ‘मनुस्मृति’ को लेकर सियासी बयानबाजी अक्सर तेज रहती है, उसी मनुस्मृति का उदाहरण देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। देश के शीर्ष न्यायालय ने कहा कि कोई मां, पिता, पत्नी या बेटा छोड़ने लायक नहीं है और जो व्यक्ति उन्हें त्यागता है, उस पर दंड लगाया जाना चाहिए। कोर्ट ने यह टिप्पणी मनुस्मृति के सिद्धांतों का हवाला देते हुए की।
सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को अपने फैसले में स्पष्ट किया कि यदि कोई बहू अपने पति की मृत्यु के बाद विधवा हो जाती है, तो वह अपने ससुर की मृत्यु के बाद भी उनकी संपत्ति से भरण-पोषण की हकदार होगी। कोर्ट ने कहा कि यह अधिकार हिंदू दत्तक ग्रहण और भरण-पोषण अधिनियम, 1956 के तहत मिलता है।
न्यायालय ने कहा कि कानून का उद्देश्य परिवार के कमजोर सदस्यों की सुरक्षा करना है और विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि भारतीय सामाजिक व्यवस्था में परिवार के प्रति जिम्मेदारी को सदियों से महत्व दिया गया है, जिसका उल्लेख प्राचीन ग्रंथों में भी मिलता है।
इस फैसले को महिलाओं के अधिकारों और सामाजिक सुरक्षा की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। विशेषज्ञों का कहना है कि यह निर्णय न केवल कानूनी स्पष्टता देता है, बल्कि पारिवारिक दायित्वों की नैतिक जिम्मेदारी को भी रेखांकित करता है।
भ्रम को सुप्रीम कोर्ट ने किया दूर
कोर्ट ने कहा कि लंबे समय से यह तर्क दिया जाता रहा है कि यदि कोई बहू ससुर के जीवित रहते विधवा हुई हो, तभी वह भरण-पोषण की हकदार है, जबकि ससुर की मृत्यु के बाद विधवा होने की स्थिति में यह अधिकार नहीं मिलता। सुप्रीम कोर्ट ने इस दलील को खारिज करते हुए कहा कि पति की मृत्यु के समय के आधार पर विधवा बहुओं के बीच किया गया यह वर्गीकरण गलत, अनुचित और पूरी तरह मनमाना है। दोनों ही स्थितियों में विधवा बहू भरण-पोषण की हकदार है।
ससुर पर बना रहता है दायित्व
शीर्ष अदालत ने अपने फैसले में कहा कि कोई भी बेटा या कानूनी वारिस विरासत में मिली संपत्ति से मृतक के सभी आश्रितों का भरण-पोषण करने के लिए बाध्य होता है। ये वही लोग होते हैं, जिनका भरण-पोषण करना मृतक की कानूनी और नैतिक जिम्मेदारी थी। कोर्ट ने कहा कि बेटे की मृत्यु के बाद, यदि विधवा बहू स्वयं या अपने मृत पति द्वारा छोड़ी गई संपत्ति से अपना भरण-पोषण करने में सक्षम नहीं है, तो ससुर का यह दायित्व बनता है कि वह उसकी देखभाल करे।
तकनीकी व्याख्या से महिला अधिकारों को नुकसान नहीं
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि अधिनियम कहीं भी यह नहीं मानता कि ससुर का अपनी विधवा बहू के भरण-पोषण का दायित्व इस आधार पर खत्म हो जाता है कि वह कब विधवा हुई—ससुर की मृत्यु से पहले या बाद में। कोर्ट ने चेतावनी देते हुए कहा कि विधवा बहू को भरण-पोषण से वंचित करना कानून की संकीर्ण या तकनीकी व्याख्या के आधार पर उसे गरीबी और सामाजिक अलगाव की ओर धकेल सकता है, जो न्याय और कानून दोनों की भावना के खिलाफ है।
इस फैसले को महिला अधिकारों और सामाजिक न्याय की दिशा में सुप्रीम कोर्ट का एक महत्वपूर्ण और दूरगामी निर्णय माना जा रहा है।



