सिंगरौली।
मध्य प्रदेश में शिक्षा को तकनीक और विज्ञान से जोड़ने के लिए करोड़ों रुपये खर्च किए जा रहे हैं, लेकिन जमीनी हकीकत इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है। सिंगरौली जिले से शिक्षा व्यवस्था की पोल खोलने वाला मामला सामने आया है, जहां डिस्ट्रिक्ट माइनिंग फंड (DMF) से करोड़ों रुपये खर्च कर खरीदी गई साइंस किट न तो बच्चों के काम आई और न ही शिक्षा की गुणवत्ता में कोई सुधार कर पाई।
लोकल साइंस किट पर खर्च हुए करोड़ों
बच्चों को विज्ञान की बेहतर समझ देने के उद्देश्य से DMF फंड से करीब 3 करोड़ 82 लाख रुपये की साइंस किट खरीदी गई और जिले के लगभग 100 सरकारी स्कूलों में वितरण का दावा किया गया। लेकिन जांच में सामने आया कि क़्वालिटी के नाम पर लोकल और घटिया सामान सप्लाई कर दिया गया।
बच्चों को नहीं पता, साइंस किट क्या होती है
पौड़ी नौगई के शासकीय पूर्व माध्यमिक विद्यालय में जब News 24 MP-CG और लल्लूराम डॉट कॉम की टीम पहुंची, तो हालात चौंकाने वाले निकले। छात्रों से जब साइंस किट के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने साफ कहा कि उन्हें नहीं पता कि साइंस किट क्या होती है। यानी किट स्कूल में होने के बावजूद बच्चों ने आज तक उसका इस्तेमाल ही नहीं किया।
बंद कमरों में धूल खा रही किट
स्कूल परिसर में रखी साइंस किट बंद कमरों में धूल खाती मिलीं। कई किट तो समय के साथ सड़-गलकर खराब भी हो चुकी हैं। इसके बावजूद न तो इनका उपयोग कराया गया और न ही किसी ने इसकी सुध ली।
बिना मांग के भेज दी गई साइंस किट
मामले पर स्कूल के प्रधानाध्यापक उमाशंकर पांडेय ने भी चौंकाने वाला बयान दिया। उन्होंने बताया कि स्कूल में कोई साइंस लैब नहीं है, दीवार पर लिखे फॉर्मूलों से ही पढ़ाई करवाई जाती है। उन्होंने यह भी कहा कि स्कूल की ओर से साइंस किट की कोई मांग नहीं की गई थी।
प्रधानाध्यापक के मुताबिक,
“जो भी साइंस किट DPC कार्यालय से भेज दी जाती है, उसे हम रिसीव कर लेते हैं। खुद से कुछ नहीं खरीदा जाता।”
सवालों के घेरे में DMF फंड का इस्तेमाल
इस पूरे मामले ने DMF फंड के इस्तेमाल पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद न तो बच्चों को इसका लाभ मिला और न ही शिक्षा व्यवस्था में कोई सुधार दिखाई दिया। अब देखने वाली बात यह होगी कि प्रशासन इस कथित घोटाले पर क्या कार्रवाई करता है और जिम्मेदारों पर कब गाज गिरती है।

डीपीसी की चुप्पी के बाद अब इस पूरे प्रकरण पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। क्या पेंट, टेंट और गोबर–गौमूत्र जैसे कथित घोटालों के बाद अब मध्य प्रदेश में शिक्षा के नाम पर भी करोड़ों रुपये का घोटाला सामने आया है? जिन बच्चों की बेहतर पढ़ाई और वैज्ञानिक समझ के लिए साइंस किट खरीदी गई, अगर वही किट स्कूलों के बंद कमरों में धूल खा रही हों और वर्षों बाद भी छात्रों को उनके बारे में कोई जानकारी न हो, तो व्यवस्था पर सवाल उठना लाजमी है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बिना मांग के करोड़ों रुपये की सामग्री स्कूलों में क्यों भेजी गई और उसके उपयोग की निगरानी क्यों नहीं की गई। जिम्मेदार अधिकारियों की चुप्पी इस संदेह को और गहरा कर रही है।
अब देखने वाली बात यह होगी कि इस मामले में कोई नया खुलासा होता है या नहीं, प्रशासन द्वारा जांच के आदेश दिए जाते हैं या फिर यह मामला भी फाइलों में दबकर रफा-दफा हो जाता है।



